Sunday, June 13, 2010

तिनका


हर रोज गुजरता हूँ हसीनो की गली से
मेरी नज़र तेरे दर पर ही क्यों ठहर जाती है

एक रोज़ भी न सोचू जो तेरे बारे में
मेरी आंख क्यों भर आती है

अश्क बिखरते हैं जो ज़मी पर
तेरी तस्वीर ही क्यों नज़र आती हैं

जब भी तुम याद आते हो
मेरी तन्हाई न जाने क्यों रो जाती है

हाथों से छुपा लेते हैं चेहरा
आंख में तिनका होगा ये बात अब कही नहीं जाती

Monday, June 7, 2010

करीब


न जाने वो मेरे करीब कैसे आ गए
एक क्षण भी न लगा उनको दिल में समाने में

और भी तो थे ज़माने में
फिर मुझे ही क्यों खिंच लाये मैखाने में

इतना पिलाया हैं उन्होंने होठों से
की जाम झलकने लगा है इन आँखों से

खूबसूरत हो गया है मेरा हर एक पल
शायद इसलिए मज़ा आता है साकी तुझको पिलाने में

मोहब्बत ही बसी है हर जर्रे जर्रे में
दर्द ही पाया है हर बार उसे जलाने में

जिन झपकियों से दूर था तू "अंजान"
आज वही काम आ रही हैं तुझे सपने दिखाने में

Thursday, May 27, 2010

नाराजगी

नाराजगी

आज मैं जो उनसे नाराज़ हुआ
तो दिल उनकी अच्छाईया बताने लगा

जिस पल भी मैंने तुझे याद किया
तो दिल गिन गिन के मुझे बताने लगा

आंख बंद करके जो रोया
तो दिल तेरे ही सपने दिखाने लगा

तन्हाई में जो तुझको महसूस किया
तो दिल तुझसे मेरा रिश्ता बताने लगा

Tuesday, May 11, 2010

छुप छुप के


तेरे यादों से में दिल लगाता हूँ
आज कल में धीमे धीमे मुस्कराता हूँ

दुनिया वालों से में यह राज़ छुपाता हूँ
आज कल में छुप छुप के मुस्कराता हूँ

तू जो मिल जाए कही
मैं नज़रें चुराता हूँ

दुनिया वालो से में यह राज़ छुपाता हूँ
आज कल मैं छुप छुप के शर्माता हूँ

सोचता हूँ तेरे बारे में
लब्जो में हर बात सजा लेता हूँ

दुनिया वालों से यह राज़ छुपता हूँ
आज कल मैं छुप छुप के गुनगुनाता हूँ


जिक्र तेरा छिड जाए तो
मैं महफ़िल छोड़ जाता हूँ

दुनिया वालो से में यह राज़ छुपाता हूँ
आज कल मैं छुप छुप के रोता हूँ


तेरे यादों से में दिल लगाता हूँ
आज कल में धीमे धीमे मुस्कराता हूँ

Monday, April 5, 2010

उम्मीद


हर शाम चली जाती हो कल का वादा करके
लेकिन तुम बिन कैसे रात गुजार पाएंगे

मोहब्बत का दीया हर रोज़ जला जाती हो
इस उजाले में हम कैसे सो पायेंगे

छुके बदन जो आग लगा गयी हो
रात भर अश्क बहा के क्या उसको बुझा पाएंगे

थक गया हूँ बेदर्द शब को समझाते समझाते
अब और अपने अश्को की शबनम नहीं बना पायेंगे

बैठा हुआ है "अंजान" इस इंतज़ार में
कल से शायद उनके आँचल में सो पायेंगे

अस्तित्व


ऐसा क्या हो गया है इंसां को
की अपने ही सुख में डूब गया है

उसके इर्द गिर्द और भी है दुनिया
क्यों उसको भूल गया है

प्यार , मोहब्बत, रिश्ते ,नातो को
क्यों पैसे से तोल रहा है

अगर पैसे से ही सुख है
फिर हर मोड़ पे रास्ता क्यों भूल रहा है

भूल रहा है जब चिल्ला रहा होगा अपने दुख से
लोग पागल कह के आगे निकल जायेंगे

जल रहा होगा जब घर
लोग हाथ सेंक कर आगे बढ जायेंगे

जल गया जब तेरा पैसा
अब दुनिया को पहचान रहा है

राख बचेगी जब तन पर
अब अपना अस्तित्व दूंद रहा होगा

Tuesday, March 30, 2010

चुप्पी


कितने भी खामोश रखो इन लबो को
पर आवाज़ लगाती हैं तेरी आँखें
छुप के चाहे कितने भी रखो कदम
पर आहट सुना देती हैं तेरी साँसे

Monday, March 29, 2010

ख्याल


लिखता हूँ ग़ज़ल तेरे ही ख्याल से
कभी तो मिलेगी तू इस दिले बेकरार से

खो जाता हूँ दुनिया के मेले में इस ख्याल से
कभी तो दूंदेगी तेरी नज़र भीड़ को चीर के

लिखते हैं ख़त हर रोज़ तुझे इस ख्याल से
कभी तो पड़ेगी तू उनको इत्मीनान से

हर रोज़ आते हैं तेरे गली में इस ख्याल से
कभी तो देखेगी तू हमें घर के झरोके से

बहने नहीं देते अश्क इस ख्याल से
कभी तो झलकेगे यह अश्क तेरी आंख से

बस जिंदगी बना के बैठे हैं तुझको इस ख्याल से
कभी तो प्यार होगा तुझे इस "अंजान" से

Sunday, March 28, 2010

इंतज़ार


चेहरे से नकाब उठा के तो देख
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

बरसों गुजार दिए रोरो के तेरे प्यार में
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

सारी उम्र निकाल दी तन्हाई में
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

जहर भी पी गए अमृत समझकर तेरे इश्क के भ्रम में
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

एक नज़र घर की चौखट पर तो डाल
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

इतनी बेरुखी तो न कर तेरी एक झलक पाने को
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

बुझने नहीं दिया इश्क का चिराग कभी तो एहसास होगा
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

मर भी गए तो फिर जन्म ले के आयेंगे
की आज भी बैठा है कोई तेरे इंतज़ार में

Saturday, March 27, 2010

दर्पण


दर्पण

दर्पण में खुद को कई बार देखा
लेकिन तेरी आँखों में
जितना खूबसूरत देखा
दर्पण में कहाँ पाया

दूंदती थी तुझ को मैं
सपनो की दुनिया में
और जब चहरे से नकाब हटाया
तुझको अपनी ही आँखों में पाया

यादों में खोई थी तेरी
की तुझ को अपने सामने ही पाया
तेरी साँसों ने जो आँचल उड़ाया
शर्म से मैंने आँखों को झुकाया

भुला के अपने सारे गम
कदमो को तेरी तरफ बढाया
बाहों में तेरी आकर
खुद को जन्नत के करीब पाया

दर्पण में खुद को कई बार देखा
लेकिन तेरी आँखों में
जितना खूबसूरत देखा
दर्पण में कहाँ पाया