Thursday, August 21, 2014

हिसाब

मांगती है साक़ी जब हिसाब पिलाने का
सोचते है नहीं कोई फायदा होश गबाने का

Tuesday, August 19, 2014

उतार दो ये बस्त्र जो तुम्हारे मैले हैं

मन तो करुणा का प्याला है 
फिर क्यों अहम पाला है 

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

जब से असत्य अपनाया है
सोचो कितने कष्ट तुमने झेले हैं

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

क्रोध में तू क्या क्या उगल गया
प्रेम को न जाने क्यों निगल गया

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

Thursday, January 30, 2014

क्या लिखूं मैं

और क्या लिखूं मैं तेरे बिछड़ने पर 
बस ये एक दिल है जो मुझसे अब संभलता नहीं

जुदाई

हर वक़्त दिल को यकीं दिलाता रहता हूँ कि तुम मेरे पास हो 
नादां है दिल एक पल कि जुदाई सह  पाता नहीं

तुम दूर हो

हॅसता रहता हूँ तन्हाई में भी 
दिल को कहीं पता न चल जाये कि तुम दूर हो