कली थी मैं फूल बनने से पहले क्यों मुरझा दिया माँ मुझे क्यों बालिका बधू बना दिया
क्या में आँगन में खेलती अच्छी नहीं लगती थी क्यों अपनी चिरिया को आँगन से उड़ा दिया माँ हम तुम तो संगी सहेली थे, सुख दुःख में साथी थे एक ही क्षण में कैसे मुझे पराया बना दिया
नए घर में न जिद कर सकती हूँ , न हँस सकती हूँ , न खेल सकती हूँ क्यों मेरा बचपन छीन लिया
जब मुझको पढना था , कुछ आगे बढना था बालिका बधू बनाकर क्यों मेरे सपनो पर विराम लगा दिया
माँ नहीं तो माँ के प्यार को रोता है
रक्षाबंदन पर बहिन के प्यार को तरसता है
इतनी अनमोल हूँ अगर मैं
फिर क्यों मुझे जन्म लेने से रोकते हो
मुझे भी इस दुनिया मै कदम रख लेने दो
मुझको भी उड़ान भर लेने दो
कुछ दूर उड़ लेने दो
दो कदम मुझे भी बढ लेने दो
मुझे भी पढ लेने दो
कब तक भीड़ मै सहारा देखूंगी
मुझे भी आत्मनिर्भर बन लेने दो
मैं खुद को संभल सकती हूँ
एक बार मुझे घर से बहार निकलने दो
ये हुस्न ,ये इश्क ,ये जिस्म तेरा दिल नसीं है पर मल्लिका -ए -मोहब्बत ये शहर तेरे लायक नहीं
राह-ए -इश्क जो तूने दिखा दिया सोचने वालों की कमी नहीं कहीं तू तवायफ तो नहीं
जनता हूँ छूते ही बिखर जाएगी तू मसीहा बनकर निकलेगा कोई घर से ऐसी इस शहर के लोगो से उम्मीद तो नहीं पर सहानुभूति दिखाने हर कोई जुलूस निकालेगा सड़को पर तेरे बिखरने ने के बाद
आरज़ू है तुझसे चेहरे से नकाब न उठाना गिद्ध जैसी नज़रों वाले लोगो की इस शहर में कमीं नहीं कहीं तू उनका शिकार तो नहीं