फिर तन्हाइयों में जीना चाहता हूँ, ऐ जिंदगी तेरा क्या इरादा है। आ गुफ्तगू कर ले, इन खामोश दीवारों से किनारा कर ले। मोहब्बत में क्या क्या कर गुजरे, उनका हिसाब कर ले, कितना तनहा रोया,कितना उनके आँचल में। आ खुले आसमां के नीचे, मोहब्बत और तन्हाई को साथ ले चले। किसका पल्ला भारी है , पूछेंगे उनसे बारी बारी
हर रोज़ खिड़की पर आकर न जाने क्या ख्वाब बुन रही थी आँखें किसी में इंतज़ार में अरसा बीत गया पत्थर हो गयी आँखें उसके इंतज़ार में घर के सामने वाली सड़क भी बिखर गयी एक मुसाफिर के इंतज़ार में