Wednesday, March 11, 2015

बड़े लोग

दरियाओं को देखा है बनते खारा, समुन्दर में मिलकर
डर लगता है बड़े लोगो के शहर में आकर

इंतज़ार

हर रोज़ खिड़की पर आकर 
न जाने क्या ख्वाब बुन रही थी आँखें 
किसी में इंतज़ार में 
अरसा बीत गया पत्थर हो गयी आँखें
उसके इंतज़ार में 
घर के सामने वाली सड़क भी बिखर गयी
एक मुसाफिर के इंतज़ार में

दर्द

हंसा हंसा के तुमने तो बुरा हाल कर दिया 
सच बताओ, कितने छुपा रखे हैं दामन में दर्द भरे किस्से 

Monday, January 5, 2015

मैं खुशनसीब हूँ कितना यह पता तो नहीं

मैं खुशनसीब हूँ कितना यह पता तो नहीं
पर तेरा ख्याल आने से ही मुस्करा लेता हूँ
ये भी कुछ कम तो नहीं


बात है कुछ  सुनी सुनी सी
की वो भी अनजान नहीं मेरी मोहबत से
खुश हूँ  मैं  अब , पराया  नहीं तेरे लिए
ये भी कुछ कम तो नहीं


मैं खुशनसीब हूँ कितना यह पता तो नहीं

साँसे

जिस्म में मेरे  कहीं तो तेरी साँसे चलती है
वरना किसी की यादो में  दम नहीं की हमको  रुला सके 

Thursday, August 21, 2014

हिसाब

मांगती है साक़ी जब हिसाब पिलाने का
सोचते है नहीं कोई फायदा होश गबाने का

Tuesday, August 19, 2014

उतार दो ये बस्त्र जो तुम्हारे मैले हैं

मन तो करुणा का प्याला है 
फिर क्यों अहम पाला है 

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

जब से असत्य अपनाया है
सोचो कितने कष्ट तुमने झेले हैं

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

क्रोध में तू क्या क्या उगल गया
प्रेम को न जाने क्यों निगल गया

उतार दो ये बस्त्र
जो तुम्हारे मैले हैं

Thursday, January 30, 2014

क्या लिखूं मैं

और क्या लिखूं मैं तेरे बिछड़ने पर 
बस ये एक दिल है जो मुझसे अब संभलता नहीं

जुदाई

हर वक़्त दिल को यकीं दिलाता रहता हूँ कि तुम मेरे पास हो 
नादां है दिल एक पल कि जुदाई सह  पाता नहीं

तुम दूर हो

हॅसता रहता हूँ तन्हाई में भी 
दिल को कहीं पता न चल जाये कि तुम दूर हो