अंधेरे में निकल जा
कहीं न कहीं जलता दीप मिल ही जायेगा
हौसले बुलंद कर
अंधेरे को चीरकर रोशनी बिखेरकर
प्रकाश तू ले ही आएगा
अंधेरे में निकल जा
कहीं न कहीं जलता दीप मिल ही जायेगा
मंजिल तू पा ही जायेगा
भूत और भविष्य को छोडक़र
चल वर्तमान को पकड़कर
वक़्त भी हार मान जाएगा
अंधेरे में निकल जा
कहीं न कहीं जलता दीप मिल ही जायेगा
- कवि अंजान "एक स्पर्श"
Monday, November 13, 2017
मैं तो दर्द की बात कर रहा था ना जाने लोग कहाँ से मोहब्बत ले आये खूब चिल्लाये मेरी गली में आकर वो मर्द के सारे बच्चे
सरहद पर खड़ा है वीर
पता नहीं जिसे वक़्त का
ना जाने कब बह जाए
समंदर रक्त का
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
ध्यान रखे हुआ है हर एक शक्श का
जब तक खड़ा है वीर मेरे मुल्क का